Tuesday, January 9, 2018

ईश्वर और दिव्यांग

पूर्वांचल मे एक लोककथा कही जाती है-
कहते हैं कि एक बार एक दोनो पैरों से लंगड़ा इंसान नदी किनारे चिल्ला रहा था कि कोई धर्मात्मा मुझे नदी पार करवा दो!
एक महापुरुष आये और दयाभाव से वो उस लंगड़े को अपने कंधे पर उठाकर नदी पार कराने लगे, नदी मे पानी कमर तक ही था, पर जैसे ही वो धर्मात्मा बीच नदी मे पहुँचे, वैसे ही पानी ऊपर उठने लगा!
अब नदी का पानी उन महापुरुष के मुँह तक आ गया और वो डूबने लगे! फिर उन्होने भगवान से प्रार्थना करते हुये कहा कि- "हे प्रभु! मैने कभी कोई अपराध नही किया, और आज भी धर्मार्थ कार्य ही कर रहा हूँ, फिर मै क्यो डूब रहा हूँ"

अचानक सामने से आवाज आयी... "रे मूर्ख! तू क्या समझता है कि मै इस मानव को पैर नही दे सकता था, पर ये पूर्वजन्म का पापी था, अतः इसे दण्ड देने के लिये मैने लंगड़ा बनाया!
अब तुमने इसकी मदद करके मेरे विधान को चुनौती दी है, अब तू भी दण्ड भुगत, और इसके साथ ही डूब जा"

खैर ये कहानी थी, पर हमारे धर्मग्रंथ भी यह कहते हैं कि जो आज दिव्यांग है, वो पूर्वजन्म के पापी थे, और ईश्वर ने उन्हे दण्ड दिया है!
फिर आखिर किस आधार पर यही ईश्वरवादी ये कहते है कि लंगड़े-लूले अपंगो की मदद करो!
क्या ऐसा करके वो ईश्वर को नाराज नही कर रहे है?
क्या वो ईश्वर के दण्डविधान मे हस्तक्षेप नही कर रहे हैं?
आखिर अपराधी का साथ देने वाला अपराधी ही होता है, तो क्या ईश्वर इनसे रुष्ठ नही होगा?

मै एक नास्तिक हूँ, और ईश्वर तथा उसके विधान को ताख पर रखता हूँ... अतः हम अगर उसके नियम तोड़े तो लाजिमी है, पर आस्तिक क्यों ईश्वर के दण्डविधान का खुला मजाक उड़ाते हैं!
गरुणपुराण कहता है कि जो लोग आज जन्म से ही शारीरिक अपंग है, वो पूर्वजन्म मे महापापी थे, फिर धार्मिक इन पापियों से क्यों सहानुभूति रखते हैं!
गरुणपुराण अध्याय-5 श्लोक 1 से 57 तक मे तमाम पूर्वजन्म के पापियों का वर्णन है!
मै बताता हूँ कि पूर्वजन्म का पापी किस कमी के साथ जन्म लेता है!

ब्रह्महत्यारा क्षयरोगी होता है!
गौहत्यारा कुबड़ा!
कन्या हत्यारा कोढ़ी!
परस्त्री गमनकर्ता नपुंसक!
गुरूपत्नि व्यभिचारी चर्मरोगी!
गुरू का निन्दक मिरगी रोगी!
झूठी गवाही देने वाला गूँगा!
पक्षपात करने वाला काना!
पुस्तक चुराने वाला अन्धा!
ब्राह्मणों को पैर से मारने वाला लंगड़ा-लूला!
झूठ सुनने वाला बहरा!
आग लगाने वाला गंजा!
अन्न चुराने वाला चूहा!
धान चुराने वाला टिड्डी!
विष देने वाला बिच्छू!
सुगन्धित वस्तु चुराने वाला छछुन्दर!
मांस चुराने वाला गीध!
नमक चुराने वाला चींटी!
फल चोरी करने वाला बन्दर!
जूता चुराने वाला भेड़!
मार्ग मे यात्रियोंको लूटने वाला बकरा!
विषपान करने वाला काला नाग!
गायत्रीपाठ न करने वाला ब्राह्मण बगुला!
अयोग्य के घर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण सुअर!
बिना निमंत्रण भोजन करने वाला कौआ!
गर्भपात कराने वाला भिल्ल रोगी!
कम तौलने वाला उल्लू!
सास-ससुर का अपमान करने वाली स्त्री जोंक!
पति का अपमान करने वाली नारी जूँ!
परपुरुष से सम्बन्ध बनाने वाली नारी छिपकली!
स्त्रीलम्पट पुरुष घोड़ा होता है!
ब्राह्मण का धन लेना वाला ब्रह्मराक्षस!
अपने गोत्र की स्त्री से सेक्स करने वाला लकड़बग्घा!
शराब पीने वाला सियार!

इसके अतिरिक्त और भी कई पाप और पापयोनि लिखी है!
अब आप लोग जरा सोचों कि आपने इनमे से कौन सा पाप किये है, और आप अगले जन्म किस रूप मे पैदा होंगे!
मुझे यह पढ़कर भी आनन्द आया कि जितने सुअर है, ये सब पूर्वजन्म मे ब्राह्मण थे, और अयोग्य के घर यज्ञ करवा कर बेचारे सुअर बन गये!
इसलिये जितने भी धर्मात्मा हो, आप सब लूले-लंगड़ो की मदद मत करो, अन्यथा आप अन्जाने मे अपने ईश्वर को नाराज कर रहे हो!
#नोट- मेरे इस पोस्ट का आशय किसी









दिव्यांग मित्र का मजाक बनाना नही है, मै जानता हूँ कि यह सब प्राकृतिक है, और उनके साथ मेरी पूरी सहानुभूति है...
मै केवल धार्मिकों और पंडो को ईश्वरी विधान बता रहा हूँ!


PAWAN PRAJAPATI

अप्राकृतिक मैथुन

#अप्राकृतिक_मैथुन
पुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे!
सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!
रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर
वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो!
यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!

 दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी!
महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....
एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी...
अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये!
दूसरी घटना विश्वामित्र की है..... जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!
इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे!
ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी!
ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे!
ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!
यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!
हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है!
जो कभी घड़े मे...
कभी दोने मे....
कभी जल मे....
तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....
खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!
रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी-रम्भा इन नंगे-फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती!
पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!
पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा!
ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!
पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!
मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"
अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।
यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है!
कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!
नोट- इस लेख के कुछ अंश ओशो के प्रवचन का हिस्सा है!

PAWAN PARAJAPATI

तुलसीदास_और_नारी

तुलसीदास_और_नारी
तुलसीदास ने रामचरित मानस मे मे एक बड़ी ही चर्चित चौपाई लिखी है-
"ढोल गँवार सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।"
इस चौपाई मे
अब सवाल यह है कि अगर तुलसीदास की नजर मे नारियाँ 'ताड़ना' की अधिकारी है, तो सीता के बारे मे उनके क्या विचार थे?
क्योंकि सीता भी तो नारी ही थी, जिसे वो "माता" मानते थे!


वो नारियों को प्रताड़ना की अधिकारी बता रहें हैं! इस चौपाई की वजह से कई नारीवादी तुलसीदास का बड़ा विरोध करते हैं, और कहते हैं कि तुलसीदास नारी विरोधी थे!
पर तुलसीदास ने पूरे मानस मे सीता के बारें मे कही भी कोई अपशब्द नही लिखा!
वास्तव मे तुलसीदास नारी विरोधी नही थे, इसका प्रमाण भी रामचरित मानस मे ही है...
इसी मानस मे नारियों के बारे मे एक और चौपाई है-
"कत विधि सृजी नारी जग माहीं।
पराधीन सपनेहु सुख नाही।।"
यह चौपाई तब की हैं, जब शिवजी के साथ पार्वती की शादी हुई और विदाई के समय उनकी माँ मैनावती रो रही थी! तब तुलसीदास को भी बड़ा कष्ट हुआ, और उन्होने कहा कि "भगवान ने नारियों को कैसे बनाया, बेचारी दूसरे के अधीन होती है, और पराधीन को सपने मे भी सुख नही मिलता"
अब इसी मानस की एक दूसरी चौपाई भी देखिये-
"अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी।।"
यह चौपाई बाबा तुलसी ने शबरी के लिये अरण्यकाण्ड मे कही है, इसमे तुलसीदास कह रहे हैं- "जो नीचों मे नीच होते है, नारियाँ उनसे भी नीच होती है"
अब यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बाबा तुलसी पार्वती को लिये आंसू बहा रहे हैं, और शबरी के लिये 'नीच' शब्द कह रहे हैं!
आखिर इसकी वजह क्या है?
हैं तो दोनो ही नारी!
असल मे पार्वती आर्य (सवर्ण) थी, और शबरी दलित (अवर्ण) थी!
तुलसीदास का नारी विरोध भी सेलेक्टिव था, वो केवल अनार्य नारियों का अपमान करते थे, सवर्ण नारियों पर उन्होने एक भी कटाक्ष नही लिखा! सीता का सम्मान बचाने के लिये तो वो झूठ भी लिखते थे!
इसका एक बड़ा उदाहरण मै आपको देता हूँ!
रामचरित मानस अरण्यकाण्ड मे तुलसीदास ने सीता और कौआ बने इन्द्रपुत्र जयन्त की कथा लिखी हैं!
तुलसीदास ने लिखा है-
"सीता चरण चोच हति भागा।
मूढ़ मंदमति कारन कागा।।"
अर्थात- अपनी मंदबुद्धि के कारण कौऐ ने सीता के चरणों मे चोंच मार दी!
तुलसीदास यहाँ 'चरण' मे चोंच मारने की बात करते हैं, जबकि सच कुछ और ही है!
यही प्रसंग बाल्मीकि ने सुन्दरकाण्ड सर्ग-38 मे लिखा है!
यहाँ बाल्मीकि साफ लिखते हैं कि जयन्त ने कौआ बनकर सीता की छाती (स्तन) पर चोंच मारी थी!
सीता खुद हनुमान को यह कथा बताती हैं, और कहती है- 'हे हनुमान! कौआरूपी जयन्त ने मेरे स्तनों पर इतने चोंच मारे कि मेरे स्तन घायल हो गये, और उसमे से खून की धारा बहने लगी'
अब जरा देखिये कि सीता के सम्मान को बचाये रखने के लिये तुलसीदास सच को किस चालाकी से हजम कर गये, और 'स्तन' की जगह 'चरण' लिख दिया!
वास्तव मे तुलसीदास घोर जातिवादी थे, और वो जाति देखकर ही नारी का अपमान करते थे! सीता एक सवर्ण महिला थी, तुलसी बाबा उनका सम्मान करते थे! अतः उन्हे झूठ बोलना स्वीकार था, पर सीता के शान मे कोई गुस्ताखी नही होनी चाहिये!


PAWAN PRAJAPATI