Tuesday, January 9, 2018

तुलसीदास_और_नारी

तुलसीदास_और_नारी
तुलसीदास ने रामचरित मानस मे मे एक बड़ी ही चर्चित चौपाई लिखी है-
"ढोल गँवार सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।"
इस चौपाई मे
अब सवाल यह है कि अगर तुलसीदास की नजर मे नारियाँ 'ताड़ना' की अधिकारी है, तो सीता के बारे मे उनके क्या विचार थे?
क्योंकि सीता भी तो नारी ही थी, जिसे वो "माता" मानते थे!


वो नारियों को प्रताड़ना की अधिकारी बता रहें हैं! इस चौपाई की वजह से कई नारीवादी तुलसीदास का बड़ा विरोध करते हैं, और कहते हैं कि तुलसीदास नारी विरोधी थे!
पर तुलसीदास ने पूरे मानस मे सीता के बारें मे कही भी कोई अपशब्द नही लिखा!
वास्तव मे तुलसीदास नारी विरोधी नही थे, इसका प्रमाण भी रामचरित मानस मे ही है...
इसी मानस मे नारियों के बारे मे एक और चौपाई है-
"कत विधि सृजी नारी जग माहीं।
पराधीन सपनेहु सुख नाही।।"
यह चौपाई तब की हैं, जब शिवजी के साथ पार्वती की शादी हुई और विदाई के समय उनकी माँ मैनावती रो रही थी! तब तुलसीदास को भी बड़ा कष्ट हुआ, और उन्होने कहा कि "भगवान ने नारियों को कैसे बनाया, बेचारी दूसरे के अधीन होती है, और पराधीन को सपने मे भी सुख नही मिलता"
अब इसी मानस की एक दूसरी चौपाई भी देखिये-
"अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी।।"
यह चौपाई बाबा तुलसी ने शबरी के लिये अरण्यकाण्ड मे कही है, इसमे तुलसीदास कह रहे हैं- "जो नीचों मे नीच होते है, नारियाँ उनसे भी नीच होती है"
अब यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बाबा तुलसी पार्वती को लिये आंसू बहा रहे हैं, और शबरी के लिये 'नीच' शब्द कह रहे हैं!
आखिर इसकी वजह क्या है?
हैं तो दोनो ही नारी!
असल मे पार्वती आर्य (सवर्ण) थी, और शबरी दलित (अवर्ण) थी!
तुलसीदास का नारी विरोध भी सेलेक्टिव था, वो केवल अनार्य नारियों का अपमान करते थे, सवर्ण नारियों पर उन्होने एक भी कटाक्ष नही लिखा! सीता का सम्मान बचाने के लिये तो वो झूठ भी लिखते थे!
इसका एक बड़ा उदाहरण मै आपको देता हूँ!
रामचरित मानस अरण्यकाण्ड मे तुलसीदास ने सीता और कौआ बने इन्द्रपुत्र जयन्त की कथा लिखी हैं!
तुलसीदास ने लिखा है-
"सीता चरण चोच हति भागा।
मूढ़ मंदमति कारन कागा।।"
अर्थात- अपनी मंदबुद्धि के कारण कौऐ ने सीता के चरणों मे चोंच मार दी!
तुलसीदास यहाँ 'चरण' मे चोंच मारने की बात करते हैं, जबकि सच कुछ और ही है!
यही प्रसंग बाल्मीकि ने सुन्दरकाण्ड सर्ग-38 मे लिखा है!
यहाँ बाल्मीकि साफ लिखते हैं कि जयन्त ने कौआ बनकर सीता की छाती (स्तन) पर चोंच मारी थी!
सीता खुद हनुमान को यह कथा बताती हैं, और कहती है- 'हे हनुमान! कौआरूपी जयन्त ने मेरे स्तनों पर इतने चोंच मारे कि मेरे स्तन घायल हो गये, और उसमे से खून की धारा बहने लगी'
अब जरा देखिये कि सीता के सम्मान को बचाये रखने के लिये तुलसीदास सच को किस चालाकी से हजम कर गये, और 'स्तन' की जगह 'चरण' लिख दिया!
वास्तव मे तुलसीदास घोर जातिवादी थे, और वो जाति देखकर ही नारी का अपमान करते थे! सीता एक सवर्ण महिला थी, तुलसी बाबा उनका सम्मान करते थे! अतः उन्हे झूठ बोलना स्वीकार था, पर सीता के शान मे कोई गुस्ताखी नही होनी चाहिये!


PAWAN PRAJAPATI

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