#अप्राकृतिक_मैथुनपुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे!
सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!
रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर
वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो!
यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!
दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी!
महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी...
अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये!
दूसरी घटना विश्वामित्र की है..... जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!
इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे!
ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी!
ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे!
ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!
यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!
हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है!
जो कभी घड़े मे...
कभी दोने मे....
कभी जल मे....
तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....
खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!
रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी-रम्भा इन नंगे-फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती!
पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!
पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा!
ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!
पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!
मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"
अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।
यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है!
कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!
नोट- इस लेख के कुछ अंश ओशो के प्रवचन का हिस्सा है!
PAWAN PARAJAPATI

काफी लोजिकल बात है, खुद इन्द्र ही दूसरो की औरतो के पीछे घूमता था सही है, प्राचीन कथाओ मे तो शंकर का भी वीर्यपात बताया गया है फर्जी कहानी है सब
ReplyDeleteतुम लोडुओ को मग भर का ज्ञान है नही
ReplyDeleteसनातन धर्म की मर्यादा भंग करने अपमान करने के हर सम्भव प्रयाश करोगे
फिर कोई तुम्हे चमार न बोले तो क्या बोले